History

प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के देहांत के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री पद जिस दिन संभाला उस दिन जब स्कूल से घर लौटा तो घर का माहौल कुछ अलग सा था। शाम ढलते जब पिता श्री महाराज कृष्ण (स्वर्गीय) घर लौटे तो बात उस समय खुल कर सामने आ गई, पिता जी ने मां सुरक्षा(स्वर्गीय) को बताया कि अब पंजाब कांग्रेस में भी भारी तबदीली होने वाली है। पिता जी के कांग्रेस के उस समय के वरिष्ठ नेता कामरेड रामकिशन से घनिष्ठ संबंध थे। कामरेड राम किशन स. दरबार सिंह धड़े से संबंधित थे और उस कारण पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री स. प्रताप सिंह कैरो के विरोधी धड़े के माने जाते थे। कैरो साहिब को पं. जवाहर लाल नेहरू का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था, सो नेहरू जी के स्वर्गवास हो जाने व लाल बहादुर शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बन जाने के कारण पंजाब की राजनीति में आने वाले बदलाव को देखकर पिता जी उत्साहित थे जिस का प्रभाव घर में महसूस हो रहा था। 1964 में 12 वर्ष का था घर के माहौल पर राजनीति और सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव बढ़ रहा था। उस समय के स्थानीय नेताओं का हमारे घर आना जाना था। इनमें से कई बाद में पंजाब स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। पिता जी जिस धड़े से संबंधित रहे उनमें से प्रमुख थे स. करतार सिंह कौमी, स. दिलबाग सिंह, स. मेला सिंह, स. सरूप सिंह सग्गू, स. सरुप सिंह , श्री तिलक राज सूरी, श्री रमेश जी, ठाकुर गणपत राय जी, श्री मनमोहन कालिया, श्री राम सरन दास, के.एस मेनन इनके अलावा जिन का घर में अकसर जिक्र हुआ करता था वे थे श्री वीरेन्द्र, लाला जगत नारायण , पं. मोहन लाल, श्री प्रबोध चन्द्र, श्रीमती सीता देवी, श्रीमती पुष्पा गुजराल। कामरेड रामकिशन जी के पंजाब के मुख्यमंत्री बनने के बाद स्थानीय राजनीति में पिता जी की पहचान और राजनीतिक दायरा भी बढ़ा। आयु बढऩे के साथ मुझे लगा कि घर में आने वाले व्यक्तियों में से कुछ को विशेष सम्मान दिया जाता है जैसे वीरेंद्र जी , लाला जगत नारायण, श्री यश, कामरेड जगजीत सिंह आनंद और रमेश जी । यह सभी लोग समाज में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल थे। इस सभी की पृष्ठ भूमि अलग थी पर इन सब में एक समानता थी। यह सभी पत्रकारिता से जुड़े थे। घर के या समाज के जिस मसले को लेकर पिता जी उलझन में होते तो सबसे पहले उपरोक्त व्यक्तियों में से ही किसी एक के साथ विचार करने को प्राथमिकता देते। मेरे मन में तब यह ही बात छा गई कि अगर कहीं जीवन में अवसर मिला तो पत्रकारिता के क्षेत्र को ही प्राथमिकता दूंगा। बस दिलों दिमाग में यह बात कहीं घर कर गई थी। पढ़ाई में कमजोर होने के कारण पिताजी का डर हमेशा बना रहा लेकिन मां हमेशा बचाने का कार्य करती। पिता जी ने हमेशा मेरे ताया व बुआ के बेटे का उदाहरण देना जो उस समय अजमेर के मियो कालेज में पढ़ते थे और पढाई में अच्छे थे। मां मेरे बचाव पक्ष मे एक ही बात कहती कि यह खेलता भी है। कालेज इसे हर वर्ष सम्मानित भी करता है फिर क्या हुआ, पढ़ाई में कमजोर है पढ़ तो रहा है। डीएवी कालेज जालंधर में जितनी देर मैं पढ़ा उतने वर्ष मैंने गुरु नानक देव विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की बैडमिंटन टीम का कप्तान भी रहा। पढ़ाई का आनंद मुझे एमए के दूसरे वर्ष में अधिक आना शुरू हुआ। इससे पहले तो मनोस्थिति यही थी कि खेल जारी रखने के लिए पास होना जरूरी है। बस उसी बात को ध्यान में रख राजनीति शास्त्र में एमए पूरी की। कालेज की शिक्षा पूरी करने के बाद पिता जी के साथ साइकिलों की दुकान पर जाने लगा लेकिन लाख कोशिशें करने के बाद भी दुकानदारी में मन नहीं लगा। 1974 से 1976 तक स्थानीय स्तर पर व्यापार किया, लेकिन 1976 में एक खेल-खेल साप्ताहिक खेल पत्रिका शुरू कर ली। साप्ताहिक ‘खेल-खेल’ शुरू करते वक्त मन में खेल तथा खिलाडिय़ों के प्रति समाज की जो उदासीनता थी उसको समाप्त करते हुए अपनी पहचान बनाना भी था। साप्ताहिक खेल-खेल शुरू होने के कुछ माह बाद मेरी शादी परिवार के पुराने परिचित आगरा के मागो परिवार जो कि संयुक्त परिवार था उनके बेटे श्री बिश्म्भर लाल जी की बेटी वीना से हो गई। वह उस समय चित्रकारी की एमए द्वितीय वर्ष की विद्यार्थी थी। शादी के बाद परिणाम आया तो पता चला कि प्रथम श्रेणी में पास हुई है। वीना को खन्ना परिवार ने नाम दिया वीनू। शादी के साथ ही साप्ताहिक पत्रिका खेल-खेल जारी रही। पत्रिका के भविष्य को लेकर उस समय के जालंधर के कार्यकारी मैजिस्ट्रेट जंग बहादुर गोयल ने कहा था इरविन जिस देश के लोग खेलों के प्रति उदासीन है उस देश में साप्ताहिक खेल पत्रिका का कोई भविष्य नहीं। शादी के बाद बढ़ती आर्थिक व सामाजिक जिम्मेवारियों के दबाव के कारण खेल-खेल के प्रकाशन को दो वर्ष के पश्चात बंद करना पड़ा। इन दो वर्षों में बड़ा बेटा पुनीत जन्म ले चुका था। 1978 में वैसाखी पर्व पर भिंडरांवाला के समर्थकों और निरंकारियों में हुए टकराव के कारण पुलिस को अमृतसर में गोली चलानी पड़ी और परिणाम स्वरूप 13 निहंगों की मौत हो गई और उसके बाद पंजाब की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में जिस प्रकार के बदलाव आ रहे थे उनसे मन पर बोझ बढ़ता जा रहा था। लाला जगत नारायण की शहादत के बाद कामरेड जगजीत सिंह आनंद और रमेश जी जिनसे हमारे पारिवारिक संबंध थे उनको मिल रही धमकियों ने मेरे दिमाग पर बहुत दबाव डाला। मुझे अपना अस्तित्व ही खतरे में लगने लगा। भिंडरावाले ने जब हिन्दुओं को मारने का आह्वान किया तो मन में प्रश्न उठा कि पंजाब में पंजाबी हिन्दू के लिए ऐसे फरमान क्यों निकाले जा रहे? उस समय 60 के दशक में भाषा के आधार पर पंजाबी सूबे के संघर्ष की बात ध्यान में आई। आर्य समाज, सनातन धर्म और अकालियों में वैचारिक मतभेद होने की बात भी कुछ-कुछ समझ आने लगी थी और साथ ही यह समझ में आ गया था कि यह वैचारिक लड़ाई है और लंबी लड़ाई है इसके लिए कुछ करना होगा। इसी बात का ध्यान रख 8 मई 1983 को ‘उत्तम हिन्दू’ का एक मासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशन शुरू किया। 1984 में रमेश जी आतंकवादियों द्वारा शहीद हुए तो उसके बाद वीर प्रताप में बतौर संयुक्त मुख्य प्रबंधक कार्य करने का अवसर मिल गया। पत्रकारिता के स्तंभ महाशय कृष्ण जी के बेटे देवतुल्य श्री वीरेन्द्र जी के साथ काम करने को मिले इस अवसर ने मेरे व्यक्तित्व को बहुत प्रभावित किया। जीवन तथा पत्रकारिता के क्षेत्र की मर्यादाओं को सीखने का अवसर तो मिला ही साथ में अपनी बात को स्पष्टता, दृढ़ता और नम्रता पूर्वक कैसे कहा या लिखा जा सकता है कलम के धनी वीरेन्द्र जी से यह बात भी सीखने को मिली। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के पत्रकारिता के आकाश में यह एक तरह से मेरी पहली उड़ान थी। इसी दौरान मेरा संपर्क हिन्दू संगठनों से भी बढ़ता गया। विशेषतया शिव सेना से, जगदीश तांगड़ी, एसके सरवाल, पुष्पेन्द्र, रमाकांत जलोटा, पवन शर्मा, रमेश भारद्वाज, तेजपाल साथी, सुरेन्द्र डोगरा, जय किशन शर्मा, डा. बलदेव राज उनमें प्रमुख थे। इन में से कुछ तो आतंकवादियों द्वारा शहीद कर दिए गए। इसी दौरान पंजाबी समाचार पत्र अजीत के संपादक स. बरजिन्द्र सिंह के साथ मुलाकात हुई जो अपने पिता डा. साधु सिंह हमदर्द जी की अचानक मौत के बाद चंडीगढ़ से प्रकाशित होने वाली पंजाबी ट्रिब्यून के संपादक पद को छोड़ पंजाबी ‘अजीत’ के प्रति अपनी जिम्मेवारियां निभाने के लिए जालंधर आ गए थे। पंजाब, पंजाबी और पंजाबी हिन्दू तथा सिखों के संबंधों को लेकर हमारी आपसी बातचीत बढ़ती चली गई और साथ में संबंध भी मजबूत होते चले गए। इन संबंधों के बारे मे यहां कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। ‘उत्तम हिन्दू’ का 1989 में ‘सांध्य’ के रूप में जब प्रकाशन शुरू हुआ तो उस समय भाई समान दोस्त बरजिंदर सिंह ने कहा कि अगर पत्रकारिता के क्षेत्र में कुछ करना चाहता है तो ‘उत्तम हिन्दू’ को सुबह के दैनिक में बदल दे। समय-समय पर इसी बात पर भाई बरजिन्द्र जोर देते रहते। इसी दौरान मुझे परिवार सहित जयपुर जाने का अवसर मिला तो उत्सुकता वश राजस्थान पत्रिका कार्यालय चला गया वहां के प्रबंधक व संपादक गुलाब कुठारी जी से मिला। कुठारी जी की भी यही सलाह थी ‘उत्तम हिन्दू’ का प्रकाशन सुबह के दैनिक में करने में ही बेहतरी है। जब जालंधर लौटा तो एक बार फिर बरजिन्द्र भाई ने कहा कि मेरी बात मान इसे सुबह के दैनिक के रूप में शुरू कर। मैंने कहा भाई बात तो ठीक है लेकिन पिता जी नहीं मानते। तब बरजिन्द्र भाई ने पिता जी से मिलने की बात कही और अगले दिन शाम को हमारे घर मेरे सामने पिता जी को अपनी बातों से इतना प्रभावित किया कि पिता जी ने ‘उत्तम हिन्दू’ के सुबह के संस्करण शुरू करने की इजाजत दे दी। 1991-92 में ‘उत्तम हिन्दू’ के सुबह और सांध्य दोनों संस्करण निकलते रहे लेकिन काम और धन के दबाव के कारण 1992 में ‘उत्तम हिन्दू’ के सांध्य संस्करण का प्रकाशन बंद कर दिया। 1992 से 1996 में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के हिंदी पाठकों के लिए ‘उत्तम हिन्दू’ नई विचारधारा लेकर आया जिसे पाठकों ने मान्यता भी दी। इस बीच सामाजिक स्तर के कई संघर्ष भी ‘उत्तम हिन्दू’ ने चलाए जिसे समाज का पूरा सहयोग मिला। लेकिन 1996 में खन्ना परिवार में दरार आई और 1997 में परिवार का विभाजन हो गया। इस विभाजन का एक कारण ‘उत्तम हिन्दू’ में हो रहा आर्थिक नुकसान भी था और इस तरह ‘उत्तम हिन्दू’ और गहरे आर्थिक संकट में पड़ गया। परिवार और समाचार पत्र की आर्थिक मांगों को पूरा करने का संपूर्ण दायित्व अब मुझ पर था। इस दायित्व को पूरा करने के लिए समाचार पत्र के पृष्ठ कम किए। फिर पारिवारिक जरूरतों पर कट लगा। तब एक संपादकीय ‘थका हूं हारा नहीं’ लिखा था जिसमें अपनी उस समय की मनोस्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया था। समय के साथ दोनों बेटे पुनीत और रितिन बड़े हो चुके थे। दोनों ने हालात व परिस्थितियों को सम्मुख रख अपना दायित्व ईमानदारी से निभाना शुरू किया। इस सारे संघर्ष में सबसे अधिक अगर किसी ने दबाव झेला तो वह मेरी पत्नी वीनू थी। जब दबाव से परेशान होती तो कहती ‘उत्तम हिन्दू’ यह समाचार पत्र तो मेरी सौतन है, परिवार का ख्याल आप कम रखते हो, इसका अधिक। सब कुछ झेलने के बावजूद हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि ‘उत्तम हिन्दू’ का प्रकाशन जारी रखना है। हर परेशानी हम दोनों की कटिबद्धता के सामने छोटी होती गई। परिवार का आर्थिक संकट बच्चों के सहयोग के साथ कम होने लगा। इसी बीच दोनों बेटों की शादियां भी हो गई, घर में बहुएं आ गई। परमात्मा दे तो सब कुछ रहा था लेकिन अखबार को चलाने का दबाव अब भी बना हुआ था। इस दौरान पंजाब में देश के बड़े घरानों द्वारा प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्रों का प्रकाशन भी जालंधर से शुरू हो गया। दैनिक जागरण समूह के संपादक संजय गुप्ता और स्थानीय संपादक निशिकांत ने जब जागरण में बतौर कार्यकारी संपादक काम करने के लिए संपर्क किया तो मैंने सहर्ष हां, कह दी। क्योंकि मैं जागरण के पूर्व संपादक स्वर्गीय नरेन्द्र मोहन जी की लेखनी से बहुत प्रभावित था। हिन्दुत्व को लेकर उनका जो दृष्टिकोण था उसका मेरे पर बहुत प्रभाव था। बड़े घरानों को समझने और धन तथा मशीनरी के महत्व को समझने और देखने का अवसर मुझे जागरण में बौतर कार्यकारी संपादक के अपने कार्यकाल के दौरान मिला। जागरण से वापस आने के बाद भी हर सुबह यही चिंता होती थी कि अखबार का घाटा कैसे कम हो। समय बीतता गया और सारा परिवार ‘उत्तम हिन्दू’ के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्षरत रहा। इन सारे वर्षों में ‘उत्तम हिन्दू’ के कर्मचारियों ने भी परिवार की तरह सहयोग दिया। मुझे भी आज याद है जब वेतन देने का समय आता था तो कर्मचारी स्वयं एक-दूसरे से पूछ लेते थे कि किस को आवश्यकता अधिक है उसी को वेतन पहले देने की बात मुझे कहते थे। वर्षों तक एक तय तिथि पर सारे कर्मचारियों को एक साथ वेतन नहीं दे पाया। हां, किसी का काम भी नहीं रुकने दिया। अपनी तथा अपने परिवार की जीवन शैली इस तरह बदली कि कम से कम धन में गुजारा किया जा सके। आज 30 वर्ष पश्चात जब अतीत के आईने में देखता हूं तो सबसे पहले आप सब सहयोगियों का जिन्होंने कठिन से कठिन समय में भी ‘उत्तम हिन्दू’ परिवार का साथ नहीं छोड़ा, आप को नत-मस्तक होता हूं। आप का यह सहयोग हमें आगे भी मिलता रहेगा। इसकी आप से आशा रखता हूं। ‘उत्तम हिन्दू’ में प्रतिदिन जो निखार आ रहा है उसके पीछे छोटे बेटे रितिन का ही मुख्य योगदान है। छोटी आयु में संघर्ष करने का लाभ उसे यह हुआ कि वह एक समाचार पत्र के हर पहलू को अच्छी तरह समझने लगा है। समाचार पत्र के आर्थिक तथा तकनीकी पहलू में संतुलन बनाकर चलने में एक तरह से विशेषज्ञ हो गया है। इसी बात का लाभ ‘उत्तम हिन्दू’ परिवार को भी मिल रहा है। बड़ा बेटा पुनीत उद्योगपति के रूप में विकसित हो रहा है और इस कारण समाचार पत्र के आर्थिक पहलू पर विशेष ध्यान देता है। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि परिवार पर परमात्मा की अपार कृपा है। आज उत्तम हिन्दू जालंधर व दिल्ली से प्रकाशित हो कर पूरे उत्तर भारत में एक संपूर्ण पत्र का दर्जा हासिल कर चुका है। इसका ऑन लाइन संसकरण (www.uttamhindu.com) पूरे विश्व में पढ़ा जा रहा है। राष्ट्रीय संस्कृति तथा इतिहास को समर्पित होकर चलने की अपनी शपथ को एक बार फिर दोहराते हुए परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि हमारे विचारों और संकल्पों को दृढ़ता प्रदान करें ताकि हम राष्ट्र तथा राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति अपने कर्तव्य को निभा सके और सत्य के पथ पर चलते हुए कलम की मर्यादा बनाए रखें। हम तो केवल पुरुषार्थ ही कर सकते हैं, शेष तो उसी के हाथ में है। 30 वर्षों के इस सफर में जो भी हमसफर रहे उन सबका एक बार पुन: आभार करता हूं और आशा करता हूं कि वह भविष्य में भी हमारे हमसफर बनकर ‘उत्तम हिन्दू’ को एक मजबूत वैचारिक तथा आर्थिक आधार देने में साथ देंगे। अनजाने में किसी के प्रति अपना आभार प्रकट करना भूल गया हूं तो उससे भी क्षमा चाहूंगा और आशा करता हूं कि आप सबके सहयोग और परमात्मा के आशीर्वाद से ‘उत्तम हिन्दू’ अपने आगे के सफर में और सफल होकर उभरेगा।